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सन १९६४, ऋषिकेश से बस चली जोशीमठ के लिए, वहाँ से डिमर गाँव पास पड़ता था। एक १३-१४ वर्षीय बालक चढ़ा क्यूँकि स्कूल में अचानक चार दिन की छुट्टी हो गयी थी। घर से कोई लेने आने का सवाल ही नहीं था। उसे गॉंव पहुँचने का रास्ता मालूम था। रास्ते में १२-१ बजे के बीच बस ड्राइवर ने एक ढाबे…

"Never stop Dreaming" किसी भी बहुत बड़े सामाजिक कार्य को करने में प्रेरणा आगे बढ़ने को उत्साहित करती रहती है। मन आशा की डोर से बँधा खिंचता चला जाता है।लक्ष्य दूर है पर विश्वास अडिग है। उस प्रकाश स्तम्भ तक पहुँचने के लिए रुकावटें भी उतनी ही प्रचंड होंगी, जितनी क्षमताएँ अगर सत्य साथ है तो मस्तिष्क उन्हें भेद लेगा…

"While every refugee's story is different and their anguish personal, they all share a common thread of uncommon courage-the courage not only to survive but to persevere and rebuild their shattered lives." -Antonio Guterres, UN High Commissioner for Refugees विस्थापन (displacement) ऐसी परिस्थिति है जो जाने-अनजाने बहुत से लोग अपने जीवन काल में झेलते हैं। कभी प्रकृति-जन्य कारणों से, कभी…

पूरे अखरोट की साबुत गिरी हाथ में लिए मैं उसकी बनावट और नसों की तुलना मानव मस्तिष्क से कर रही थी कि वाट्सएप पर बहुत ही सुंदर तस्वीरों का पावर पॉइंट मैसेज आया जिसमें संकेत था कि मनुष्य अहंकार में अपने को सबसे ऊँचा दिखाने का प्रयास करता है और ब्रह्माण्ड के संदर्भ में उसका अस्तित्व कितना है? कुछ वर्ष…

मणिकर्णिका घाट के पीछे दीपक, अनिता और मैं बहुत सी गलियाँ, ऊँची हवेलियाँ और दरवाज़ों में बने छोटे दरवाज़े पार करते चले गए पर हमें आज का लक्ष्य काशी लाभ भवन कहीं ना मिला। उसके बहाने ज़रूर हमने सदियों से बसे वाराणसी के असली दर्शन किए। आज से तीन हज़ार साल पुराना शहर का नक़्शा कैसा रहा होगा उसकी तो…

काशी की गालियाँ घूमते-घूमते हमें तीन दिन पूरे हो गए। समय कहाँ निकल गया? कभी गंगा के घाटों पर, कभी सीढ़ियों पर, कभी हैरान कर देने वाली संकरी गलियों में। पुरानी हवेलियों, भवन जिनमें दादा-परदादा के ज़माने से बसे परिवार देखे। परिवारों के बीच बन गयी दीवारें, सबने अपनी-अपनी आवश्यकता के अनुसार संयुक्त से एकल की परिभाषा सीख ली। हवेलियों…

काशी लाभ 'मुक्ति भवन' के दर्शन करने के बाद दीपक ने डायरी से नया पता निकाला मुमुक्षु भवन, आनंदबाग़, भेलुपुर वाराणसी। काशी के घाटों की चहल -पहल हम बहुत समीप से देख चुके थे। सभी घाट गंगाजी में उतरते हैं और चंद्राकार बहती हुई गंगाजी उत्तर की तरफ़ मुड़ जाती हैं। काशी प्राचीन काल में दो नदियों के बीच बसायी…

चारों तरफ़ खिली धूप और सन १९०८ की बनी दोमंज़िला इमारत जो जीवन के सत्य की साक्षी है। उसके दरवाज़े हर पल, हर घड़ी खुले हैं। हवा के झोंके की तरह शरीर के बंधन में उलझी अात्मा यहाँ आती है। कुछ गहराती सांसें, अवचेतन मन, साथ छोड़ता शरीर और सही मौक़ा पाकर अनंत में विलय। सब कुछ सहज धरती से…

"काशी मरत मुक्ति करत एक राम नाम महादेव सतत जपत दिव्य राम नाम प्रेम मुदित मन से कहो राम राम राम श्री राम राम राम श्री राम राम राम".... बचपन में बड़ी बहन की मधुर आवाज़ में यह भजन बहुत बार सुना था। इसकी राम धुन सहज ही आकर्षित करती थी। उस समय काशी को हम ऐसे तीर्थ स्थान की…

लम्बी हवाई यात्रा तीन -तीन मूवीज़ देखने के बाद अब क्या करें? कॉफ़ी बनायी और थोड़ी वॉक कर ली। जहाज़ की परिचरिकाओं से भी बात करली.... सीट पे आकर बैठे, लगा चलो हिंदी गानों की विडीओ देखते हैं। खोलते ही ए आर रहमान का गीत आ गया दिल से रे........एक सूरज निकला था, कुछ पारा पिघला था। एक आँधी आयी…

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