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चारों तरफ़ बच्चों की किलकारियाँ,आवाज़ें गूँज रही हैं। कुछ बच्चे आपस में किसी बात पर खिल-खिलाकर हँस रहे हैं, कुछ सहमे से एक बेंच पर बैठे चारों तरफ़ खाली-खाली निगाहों से देख रहे हैं। हमारे चाइल्ड हेल्प केअर सेंटर में बहुत सी जगह मेक्शिफ़्ट टेंट्स के ज़रिए सिर्फ़ बच्चों के खेलने और अन्य कार्यों के लिए बना दी गयी है। मेरे जैसे अनेक वालंटियर हफ़्ते में चार दिन यहाँ आते हैं। शहर से यह स्थान तक़रीबन चालीस मिनट की दूरी पर है। हमारे आने तक इन्ही के बड़े भाई -बहन या माएँ आकर सेंटर साफ़ कर देती हैं और हम बड़े-बड़े बोरों में या कार्टन में खाने का सामान,कपड़े,जूते मोज़े,खिलौने, दवाइयाँ, स्कूल किट और टीचिंग एड्ज़ लेकर आते हैं। ६००० से ज़्यादा रिफ़्यूजी यहाँ रहते हैं। इनके बीच कम से कम ३५०० बच्चे हैं और हर दसवीं स्त्री गर्भवती है पर सभी बच्चे इस सुविधा का लाभ नहीं उठा सकते क्यूँकि यह ट्रांज़िट देश है और डेस्टिनेशन देशों में से किस देश में उन्हें पनाह मिलेगी यह कोई नहीं जानता। यह स्थान ट्रान्जिट कैम्प की तरह आबाद रहता है। हर दिन आधे लोग किसी दूसरे देश भागने की तैयारी में सड़कों पर खड़े हो जाते हैं और ट्रकों के पीछे, गाड़ियों में या सामान के बीच में छिपकर दूसरे देशों की सीमाओं में गैरकानूनी प्रवेश ले लेते हैं यहॉं रह सकने लायक हालात हैं भी नहीं।

“Human dignity ,freedom,democracy,equality,rule of law and respect for human rights.”

बस यही चाहिए इन शरणार्थियों को जिसे समझने में समर्थ देशों को समय लग रहा है। ये परिवार युद्ध से त्रस्त हमारी ओर इसी आशा से देख रहे हैं। इन्हें सहानुभूति चाहिए पर शुरु में मिला क्या अपमान और झिड़कियाँ। इन शरणार्थियों का लक्ष्य हैं – इटली, नोर्वे, स्वीडन, फ़िनलैंड और जर्मनी जाने का, जहाँ बच्चों को अच्छी देखभाल और सहायता मिलती है पर अधिकांश फँसे हुए हैं टर्की, ईजिप्ट, क्रोएशिया, ग्रीस, जॉर्डन और सर्बिअा में, जहाँ इतनी अधिक संख्या में शरणार्थी सम्हाल पाना उनकी आर्थिक क्षमता से बाहर है। ये सभी बच्चे ऐसे परिवारों से आए हैं जहाँ पारिवारिक सम्बंध बहुत मायने रखते हैं। उनकी जीवन शैली में माता-पिता और खान-दान का महत्त्व बहुत बड़ा और गहरा है। युद्ध की विभीषिका में सब तितर-बितर हो गया। इन कैम्प्स के बीच में चलने-रहने से पता चलता है कि परिवार के लोगों के साथ-साथ जब आपका सब कुछ छिन जाए तब कैसा लगता है? आप अकेले कैसे जीते हैं।

टेंट्स में रहने को मजबूर बच्चे हरी घास में खेलना चाहते हैं जो कॉंटों की बाड़(barbedwire) के पार सब तरफ़ दिखायी देती है। मैदानों में दौड़ना चाहते हैं पर मज़बूत काँटों की बाड़ उन्हें जंगल में जेल की परिभाषा सिखाती है। सबको घर वापस जाना है वो घर जो उनकी आँखों के सामने ही ध्वस्त हुआ था। अब उनकी आँखों में एक ही सपना है पढ़ने का, स्कूल जाने का।यूरोप के बॉर्डर कंट्रोल से ज़्यादा आवश्यक है इन्हें डूबने से बचाने का। चाहे मैडिटरेनियन की नाव हो चाहे जीवन की नाव,सहायता की पहल हमें करनी है।

यहाँ कैम्प्स में सहानुभूति, भाईचारा, मिल-बाँट कर खाना, रहना, एक दूसरे की सेहत पूछना ही पैसे की तरह काम करता है। पैसे तो है ही नहीं, कमाने का कोई ज़रिया भी नहीं। अभी ख़ुद का वजूद ही गैरकानूनी है तो नौकरी कहाँ करेंगे? चैरिटी में मिला सामान और खाना… सिर माथे।

अपने बाज़ुओं पर भरोसा कर नाव में बैठे किसी तरह दूसरे किनारे पहुँचे तो पुलिस का सामना किया। शहर में जाने की मनाही थी। रेलवे लाइन पर ही पैदल चल दिए। हज़ारों मर्द, बीबी, बच्चे सभी पैदल, कहीं पकड़े गए तो पुलिस ने कैम्प्स में पहुंचा दिया। थोड़ा- बहुत जो खाने को मिला, वो मिल-बाँट कर खाने का प्रयास किया। पैसा था ही कहाँ? सब तो मानव तस्करों ने छीन लिया नाव में बैठते ही और अपने देश का पैसा यहाँ क्या काम आएगा? चल सकने की ताक़त ना रही तो ट्रैक के किनारे ही प्लास्टिक झुग्गी लगाई। ऐसे में आपसी सहानुभूति और भाई-चारा ही रह जाता है जो आपस में बाँट सकते हैं। वही करेन्सी है वही जीवन जीने की कला।

ऐसी स्थिति में बच्चे सबसे ज़्यादा सहन करते हैं। कई बच्चे ऐसे हैं जो महीनों से बिस्तर पर नहीं सोए। कई बच्चियों की १२-१३ साल में शादी कर दी गई ताकि उसकी ज़िम्मेवारी उसका शौहर सम्हाले। कुछ मॉंओं ने जिनके बच्चे अधिक थे एक दो बच्चों को सामान लादने के लिए अपने दूर के या गॉंवों के लोगों के साथ भेज दिया और उस बच्चे ने उनके अत्याचार सहे। अनेक बच्चे तो ऐसे हैं जिनके माता-पिता साथ है ही नहीं। उनकी घर में दब कर मृत्यु हो गयी। सुबह बच्चा ख़ुश हाल घर छोड़कर गया और जब लौटा तो घर की जगह मलबे का ढेर देखा और उसमें दब कर मरे परिजन। पास पड़ोसियों ने बच्चों को किसी तरह नावों में या गाड़ियों में भरकर यूरोप के लिए रवाना कर दिया।

यहाँ परीक्षा थी मानवता भरे हृदय की ।

क्या दूसरे देश के समुद्री तट पर वहॉं के लोग उनका स्वागत के लिए तैयार थे? नहीं, वो बच्चे पुलिस के हाथ लगे, जिन्होंने कभी मारा, कभी सिगरेट से जलाया और खाने को इतना ही दिया जितना ज़िंदा रह सकें। उन्हें भी समझ नहीं आ रहा था कि इतनी आबादी को कैसे सम्हालें, तब UNHCR ने अपील की। सभी देशों के शीर्ष नेता साथ बैठे और योजनाएँ बनायी गयीं। सभी ने कुछ हद तक सहायता देने का वचन दिया और बच्चों के लिए NGOs सामने आए।

फ़र्स्ट रिसेप्शन कैम्प्स में बच्चों को रजिस्टर किया, अनाथ बच्चों को सबसे पहले सम्हालने की कोशिश की। उन्हें कपड़े, खाना, साफ़ सफ़ायी से रहना सिखाने की ज़िम्मेवारी ली और उनके साथ घटी दुर्घटनाओं के ट्रॉमा से बाहर निकालने का प्रयास किया। इन कैम्प्स में बच्चे सिर्फ़ सीरिया से ही नहीं आए वरन अफगानिस्तान, ईराक़, ईरान, सुडान, गुएनीय, एरिट्रेअा सभी देशों से आए हैं।

मोहम्मद को अफगानिस्तान से चले चार महीने हो चुके हैं उसके कुछ परिवार वाले वहीं हैं। रास्ते में उसका पैर टूट गया। अस्पताल में जब तक पहुँचा तो पैर टेढ़ा हो गया था। ऑपरेशन होना चाहिए था पर उन्होंने पट्टियाँ बाँध दीं, उसको दर्द की दवाई की ज़रूरत थी पर फार्मेसी तक जाने नहीं दिया गया। हाथ में पर्चा लिए किसी कैम्प में दो हफ़्ते पड़ा रहा, जब दर्द होता था तो चादर से मुँह दबा लेता था। उसकी भाषा जानने वाले कुछ लड़के उसे खिला-पिला रहे थे। तभी किसी volunteer की निगाह उस पर पड़ी वो उसे ज़बरदस्ती बाहर निकाल कर लायी। मेडिकल एड रेस्क्यू गाड़ी में रखा और NGO की सहायता द्वारा आधे गले पैर का ऑपरेशन करवाया। आज क्रच के सहारे वो चल सकता है। हँसता है, जब उससे पूछा तो बताया,गॉंवो में जीप पर बैठते समय चाचा ने सिर पर हाथ फेरा था और कहा था,”जाओ,वहॉं पढ़-लिखकर बड़ा आदमी बनना और कुछ सालों बाद यहाँ आकर गॉंव का भला करना। खुदा तुम्हें देखेगा।” आज चार महीने बाद भी उसका शरणार्थी कागज सब अस्वीकृत हैं। स्कूल तो बहुत दूर का सपना है फिर भी वो कहता है। मैं ज़िन्दा तो हूँ ना ज़रूर मेरे दिन भी बदलेंगे। पैर ठीक होते ही मैं जर्मनी चला जाऊँगा। वहॉं स्कूल में दाख़िला लूंगा।

ऐसे सपने लिए ना जाने कितने बच्चे कैम्प्स में भटक रहे हैं। जिन्हें NGOs ने सम्हाल लिया उनका जीवन थोड़ा रास्ते पर आ गया पर जिन्हें अभी सरकारी स्वीकृति नहीं मिली वो दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं।

शरणार्थी बच्चों को शिक्षा मिलना अत्यंत आवश्यक है। इससे देश के समाज पर तुरंत सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। शिक्षा अपने-आप पर भरोसा बढ़ाती है। बच्चों के मनोभावों और शारीरिक गठन में सहायता देती है। उन्हें स्वास्थ्य और अपनी साफ- सफ़ायी का ज्ञान मिलता है। जो इस ट्रान्जिट पीरियड में अंतिम प्राथमिकता में रहता है।

ध्यान देने योग्य बात यह है कि सभी बच्चे नए देश में आकर पढ़ना चाहते हैं कुछ बनना चाहते हैं। सोमालिअा, एरिट्रेअा या सुडान से आए बच्चे इतनी ग़रीबी से आए थे कि वहाँ दो वक़्त का भोजन और स्कूल मयस्सर नहीं था पर यहाँ आकर सभी ने पढ़ने की, स्कूल जाने की इच्छा ज़ाहिर की।

सभी बच्चों को इतना ज्ञान तो ज़रूर है कि स्कूल जाने से भविष्य सुधर सकता है। स्कूल आकर वो बीती दुर्घटनाओं को भूल जाते हैं। उन्हें नया संसार रास आने लगता है।

बहुत से बच्चे ऐसे हैं जो नन्हें-नन्हें भाई-बहनो को भी पाल रहे रहे हैं। उनके माता-पिता रास्ते में ही मृत्यु को प्राप्त हो गए। जो उन्हें यहाँ तक लाए वो दूर देश चले गए। कोई किसी और की ज़िम्मेवारी कैसे ले? जब ख़ुद का ही कोई ठिकाना नहीं।

बचपन में ही बड़े हो गए ये सात-आठ साल के बच्चे दूसरों की मदद से एक दो साल के नन्हें-नन्हें बच्चों को गोदी से चिपकाए सेंटर के आस-पास घूमते मिल जाएँगे। उनके लिए खाना खिलाने से लेकर नहलाना-धुलाना सब करते हैं। चाइल्ड स्पेस सेंटर से इन्हें बहुत मदद मिल रही है। आशा और रोज़ाना की दिनचर्या भविष्य के लिए रोने का मौक़ा ही नहीं देती। कहीं तो कुछ है जो जीने का अवसर दे रहा है।

प्रोजेक्ट फयुएल की सदस्या से एक १४ वर्षीय बालक हनी ने अपना लाइफ लेसन बताया-
“Life is hard but being angry about it doesn’t help anyone.”

Indeed you have become very wise Hani.

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बचपन से प्रकृति की गोद में पली-बढ़ी श्रद्धा बक्शी कवि और कलाकार पिता की कलाकृतियों और कविताओं में रमी रहीं। साहित्य में प्रेम सहज ही जागृत हो गया। अभिरुचि इतनी बढ़ी कि विद्यालय में पढ़ाने लगीं। छात्रों से आत्मीयता इतनी बढ़ी कि भावी पीढ़ी अपना भविष्य लगने लगी। फ़ौजी पति ने हमेशा उत्साह बढ़ाया और भरपूर सहयोग दिया। लिखने का शौक़ विरासत में मिला जो नए कलेवर में आपके सामने है......

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