Top Menu
FUEL Human festival,2019

लगा कुछ ऐसा जब पहुँची Salwoods ! एक ऐसा जंगल हो रहा जहॉं जंगल में मंगल ही मंगल, गहरी घाटी नवेली दुल्हन कलरव चिड़ियों का युवा ह्रदय करते स्पन्दन, लगा कुछ ऐसा, आ गई हूँ अनोखे कार्निवल में खिले हैं जहॉं अनेकों मुस्कुराते फूलों सरीखे मुखड़े, बहुत करते हैं आकर्षित मुझे मुसकुराहटों में दमकते चेहरे, उनके झुण्ड से आते ठहाके…

पर्वतीय क्षेत्रों की सैर कर के आए लोगों से अगर आप पूछें कि क्या देखा ? सभी प्राकृतिक सौंदर्य के वर्णन के साथ अनायास कह उठते हैं पहाड़ों पर पहाड़ों को जीतती पहाड़ी स्त्रियों को काम करते देखा। इसमें कोई दो राय नहीं है कि पहाड़ों का चप्पा - चप्पा अगर किसी से परिचित है तो वह हैं यहाँ की…

क्या आपने फिल्म मॉंझी देखी है ? देखी ही होगी । उसमें बाबा द्वारा पहाड़ खोदते २० सैकण्ड का डायलॉग है-बाबा गुस्से से एक पत्रकार को बोल रहे हैं , "हम पागल हैं पागल । ये सही गलत का पूछ रहे हैं हमसे ? हमें तो खुद ही नहीं पता हम क्या कर रहे हैं यहॉं ? सही गलत पूछ…

पिताजी के एक बाल सखा हैं श्री अन्नाभाऊ कोटवाले साहब, जो उनके स्वर्गवास के समय समाचार मिलते ही आ गए थे। दुःख में अपने साथ होते हैं तो सहनशक्ति बढ़ जाती है। समय के साथ दुःख की तीव्रता तो कम हो जाती है, पर खालीपन रह जाता है। दो तीन माह पश्चात वे एक बार फिर घर हाल-चाल जानने आए।…

सौढ़ का प्राकृतिक सौंदर्य इतना रमणीय है कि कुछ समय तो मन अभिभूत धन्यवाद के अन्दाज़ में ही रहा। धन्यवाद समय को, धन्यवाद परिजनों को, धन्यवाद उन गुरुओं को जिन्होंने इस सुंदरता को आत्म सात करने के लिए निगाह तराशी। गॉंव वालों का अपनापन ऐसा था कि हम सब एक परिवार की तरह उठ -बैठ, खा-पी, रहे थे। वो थोड़े…

सुबह-सवेरे पाँच बजे चूड़ियों की खनक, खुरपी की छप्प-छप्प, कुदाली से मिट्टी के ढलों की टूटन, पौधों को जड़ों से उखाड़ने की आवाज़, फिर धरती पर झप-झप, सब कुछ एक लय - एक गति। कुछ ऐसा जो बहुत पुरानी यादों का पिटारा खोलता सा लगा। कुछ ऐसा धरती से जुड़ा संगीत जिसे सुनकर मन प्रफुल्लित हुआ। मैं झट से उठकर…

"मेरे पापा को लाऽओ। मेरे पापा को ल्लाओऽऽ?" ममता दिव्यांग है। देखने में सात आठ वर्ष की लगती है पर है पन्द्रह वर्ष की। कुछ दिन पहले ही उसके पापा का स्वर्गवास एक्सीडेंट से हो गया था। जब पापा थे तब समय से ममता को स्कूल से लाने, ले जाने की जिम्मेवारी बहुत लगन से निभाते थे। धूप, सर्दी, पानी,…

ट्रेन के सिटिंग कम्पार्ट्मेंट में बैठे हम बहुत उत्सुकता से बोलपुर स्टेशन का इंतज़ार कर रहे थे। कोलकाता से बहुत लम्बा रास्ता नहीं था। पर आज बचपन की मुराद पूरी होने जा रही थी। हम शांति निकेतन की यात्रा पर थे। किसी ज़माने में माँ की बहुत इच्छा थी कि मैं शांति निकेतन से ग्रैजुएशन करूँ। बचपन से कहती थीं…

लिओ तोलस्टोय और ऐंटॉन चेकोव को पढ़ने के लिए लोग रूसी भाषा सीखते हैं ताकि उनकी रचनाएँ पूरी तरह समझ सकें। उसी तरह ऋषि व्यास महर्षि और कालिदास को समझने के लिए जर्मन... जी हाँ, जर्मन संस्कृत पढ़ते हैं। ज़्यादा दूर नहीं सिर्फ़ पुदुच्चेरी घूम आइए विदेशी original संस्कृत के ग्रंथ हाथ में लिए मुस्कुराते हुए मिल जाएँगे। माहौल में…

बहुत सही नारा है। हर गली-मुहल्ले, टेलिफोन वार्तालाप, स्कूल, यूनिवर्सिटी की कैंटीन या नुक्कड़ नाटक के dialogue में अक्सर सुनायी पड़ रहा है। Change- yes, Change in what? परिस्थिति, वातावरण, राजनीति या आर्थिक नीति? कहाँ चाहिए change? इस change को लानेवाला कौन है? अलादीन का चिराग़-जिन्न या देश का युवा? जो सोचता बहुत है दम-ख़म भी रखता है पर पहल…

Powered By Indic IME
Close